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प्यार को पुष्पित-पल्लवित करने का दिन बने वेलेंटाइन-डे

Posted On: 9 Feb, 2014 Others में

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वेलेंटाइन-डे या यूं कह लें कि प्रेम दिवस !
प्यार करने का दिन या प्रेम के इजार करने का दिन या कुछ और?
आखिर प्यार तो प्यार होता है चाहे वह मां से हो, बहन से, भाई से या किसी और से!
प्रेम में प्रदर्शन या दिखावा करने की क्या जरूरत है। प्यार तो प्यार है बस प्यार!
कई दिनों से प्रेम दिवस का चिल्ल-पों सुनाई और दिखाई दे रहा है। तरह-तरह के दिन मनाये जा रहे हैं मसलन रोज-डे, चाकलेट-डे इत्यादी। फेसबुक पर या अखबारों में, वो भी एक खास तबके के बीच या यूं कह लें कि युवाओं में वो भी कस्बाई इलाकों की बनिस्बत शहरों व नगरों में ज्यादा है। सोसल साइट या वर्चुवल दुनियां में प्यार को प्रचारित-प्रसारित करके हम इसको कहां तक बिखेर सकते हैं यह कह पाना मुश्किल है मगर इतना तो कहा जा सकता है कि प्यार को जब तक हम असल जिन्दगी में नहीं अपनाते तब तक इसके मूल रूप से हम परिचित नहीं हो सकते।
आखिर प्रेम सिर्फ युवाओं को ही करना चाहिए या सबको यह सवाल भी मेरे जेहन में कई दिनों से कौंध रहा है। प्रेम दिवस होना चाहिए मैं भी इसके पक्ष में हूं और आज के परिवेश में इसकी सख्त जरूरत है मगर इसका मकसद सिर्फ चन्द लोगों को अपने निजी ख्यालात व इजहारात जाहिर करने की बजाय अवाम के अन्दर आपसी अखलाक पैदा करना हो। जाति-धर्म के नाम पर दंगा-फसाद कराकर कुछ लोग इंसानो के बीच नफरत की खाई पैदा कर रहे हैं। आज जिस तरफ पूरे विश्व में रंग, समुदाय, धर्म-जाति, सम्प्रदाय के नाम पर विभेद दिखाई दे रहा है उसको मिटा कर सामाजिक समरस्ता का माहौल बनाने की जरूरत है जो सिर्फ और सिर्फ प्यार से मुमकिन है। प्यार असल में वो रोशनी है जो इंसानी जज्बात को रूहानी एहसास में पिरोता है। प्यार में बड़ा-छोटा, उंचा-नीचा और कालागोरा जैसे अल्फाज के लिए कोई जगह नहीं। यहां मैं नहीं हम के भावना की डोर लोगों को एक में पिरोती है। प्यार को दिन व दायरे में कैद करना इसकी मूल भावना को चोटिल करना है। प्यार तो वह सागर है जिसमें पूरा विश्व समाहित हो कर मानवता के मंथन से एकता व बंधुत्व का अमृत निकालकर मानव कल्याण को सिंचित करने का संकल्प ले।
चन्द रोजा रिश्ता बनाने व उसका नाजायज इस्तेमाल करने के वास्ते एक लड़का व एक लड़की वेलेंटाइन-डे मनाये तो यह प्यार का मजाक उड़ाने के सिवा कुछ नहीं हो सकता। आज समाज को जरूरत है प्यार के बुनियादी मतलब समझने का। क्या कहता है प्यार? इसके जाने बिना इसका मजाक उड़ाना बेहद अफसोसनाक है। मीरा ने भी प्यार किया था, गोपियों को भी प्यार था मगर उन्हे किसी वेलेंटाइन-डे की दरकार नहीं थी! प्यार को हफ्ते भर विभिन्न रूप से इंज्वाय करके उसका उपहास उड़ाना किंचित जायज नहीं हो सकता। प्यार को जीवन में उतार कर खुद के आचरण के माध्यम से लोगों में बिखेरने की जरूरत है। ताकि समाज में सदभाव व समरस्ता का माहौल पैदा हो। आज जरूरत है प्यार को सच्चे दिल से अपनाने की, प्यार के सतरंगी फूल सबके दिलों में खिलाने की। प्यार के कोमल एहसासों को बिखेरने व पुष्पित-पल्लवित करने का दिन अगर वेलेंटाइन-डे बने तो सार्थक होगा वर्ना सिर्फ और सिर्फ चोचलों व ढ़कोसलों से ज्यादा वेलेंटाइन-डे नही हो सकता।

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1 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Jitendra Mathur के द्वारा
December 9, 2015

ना उम्र की सीमा हो, ना जन्म का हो बंधन, जब प्यार करे कोई तो देखे केवल मन । बिलकुल सही ख़यालात हैं आपके । आपकी बात बिलकुल ठीक है कि प्यार तो माँ, बाप, भाई, बहन आदि किसी के भी लिए हो सकता है । और वैलेंटाइन डे भी ऐसे हर तरह के प्यार को अभिव्यक्त करने के लिए है, केवल लड़के-लड़की के रोमांटिक प्यार को अभिव्यक्त करने के लिए नहीं । लेकिन अफ़सोस, हमारे यहाँ आधुनिकता के रंग में रंगे बहुत-से युवा प्यार का मतलब न जानते हैं और न समझना चाहते हैं । उनके लिए तो मौज-मज़ा ही सब कुछ है । वे वैलेंटाइन डे को भी उसे रूप में देखते हैं । लेकिन जो सच्चा प्यार करने वाले अपने प्यार के इज़हार के लिए इस दिन को चुनते हैं, उन्हें नैतिकता के ठेकेदारों का क़हर झेलना पड़ता है । कभी-कभी लगता है कि हिंदुस्तान में नफ़रत करने का हक़ तो सबको है, प्यार करने का किसी को नहीं । इसीलिए हमारे यहाँ अब नफ़रत की ही फसल लहलहाती है, प्यार की नहीं ।


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