रैन बसेरा

हक बात, बुलन्द आवाज

45 Posts

78 comments

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.
blogid : 4723 postid : 1145653

चारदीवारी

Posted On: 13 Mar, 2016 कविता में

  • SocialTwist Tell-a-Friend

चारदीवारी की बन्दिशों में कैद हैं अरमानों के सपनें
मन के मयूर पंखों से जीवन के उस पार आती हूं तुमसे मिलने
न खुद की चाह, न मन की सोच
बस समाज के जंजीरों में जकड़ी हैं जीवन की रस्में
अनाम रिश्ते की डोर में जकड़ें हैं हम दोनों
हालात के लाचारीयों से मजबूर काफी दूर खड़े हैं मानों जैसे हों बेगाने
रूकती, थकती सांसों की डोर में पिरोकर मुझे जीते हो तुम
मैं हर वक़्त तुम्हारी लाचारीयों पर बेबस निगाहों से ऐसे देखता हूं मानो हूं अंजाना
मन की व्यकुलता, जीवन की चंचलता
वक़्त के दराज में है ऐसे कैद हैं मानों मुठ्ठीयों में रेत
इन बन्दिशों के पार भी तो जाना होगा इक दिन
समाज, सभ्यता, संस्कार की चिता पर आखिर कब तक जलते रहेंगे अरमानों के सपने
चारदीवारी के उस पार है जीवन का बासंति रूप
अभी नहीं तो क्या हुआ, आउंगी चारदीवारी को लांघकर तुमसे मिलने।।



Tags:

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (No Ratings Yet)
Loading ... Loading ...

0 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments


topic of the week



latest from jagran